संत तुकाराम पर निबंध Essay on sant tukaram

संत तुकाराम पर निबंध Essay on sant tukaram 

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दोस्तों यहाँ पर आप संत तुकाराम का जीवन चरित्र के बारे में जानकारी प्राप्त करेंगे तथा उनके महान व्यक्तित्व के बारे में जान पायेंगे, तो आइये शुरू करते है, यह लेख संत तुकाराम पर निबंध:-

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संत तुकाराम पर निबंध


संत तुकाराम कौन है Who was sant tukaram 

भारत भूमि पर हमेशा समय-समय में विभिन्न महात्माओं संतो तथा वीर पुरुषों ने जन्म लिया है और उन्होंने अपने महान कार्यों के द्वारा मानव समाज तथा मानव कल्याण के लिए कई अभूतपूर्व कीर्तिमान स्थापित किए हैं और उन कार्यों के कारण उन्हें हमेशा ही जाना जाता है तथा उनका सम्मान प्राप्त होता है।

उन्ही महान आत्माओं में से एक थे "संत तुकाराम" संत तुकाराम वैष्णव संप्रदाय के अनुयाई तथा हमेशा ही भक्ति तथा लोगों के कल्याण में लीन रहा करते थे। संत तुकाराम के गुरु का नाम बाबा चैतन्य था और उनकी प्रेरणा से ही उन्होंने 17 वर्ष तक ही रामकृष्ण हरी मंत्र का उपदेश प्राप्त कर लोगों को सत मार्ग पर चलने की शिक्षा प्रदान की। 

संत तुकाराम का जन्म Birth of Sant tukaram 

जन जन की सेवा करने वाले संत तुकाराम का जन्म सन 1520 में पुणे के एक गाँव देहु में हुआ था, किंतु उनके जन्म के विषय में कई इतिहासकारों तथा संतों में एक मत नहीं दिखाई देता है, जिसका प्रमुख कारण है, कि उनके जन्म के विषय में कोई ठोस प्रमाण प्राप्त नहीं है, जो एक सत्यता स्थापित कर सके।

संत तुकाराम जन्म से ही प्रखर बुद्धि के तथा दयालु भाव के थे। वे चिड़ियों को दाना चुगाया करते थे, गरीबों की सेवा करते थे तथा असहाय लोगों को सहारा प्रदान करने के साथ सत्य धर्म मानव सेवा की शिक्षा दिया करते थे।

संत तुकाराम के माता पिता कौन है Who was parents of Sant tukaram 

संत तुकाराम के पिताजी का नाम बहेबा (बोल्होबा) था, जो एक साधारण परिवार से संबंध रखते थे तथा उच्च विचारों वाले थे, जबकि उनकी माता जी का नाम कनकाई था, जो एक धार्मिक प्रवृत्ति वाली महिला थी। संत तुकाराम का बचपन बड़ी ही सरलता से तथा आनंदमई स्थिति में बीता,

किंतु जैसे ही संत तुकाराम 18 वर्ष के हो गए तो उनके माता-पिता का देहांत हो गया और इस समय अकाल पड़ जाने के कारण उनकी पहली पत्नी और बच्चे का भी निधन हो गया दूसरी पत्नी एक कर्कश स्त्री थी और उन्ही के कारण उनका मन गृहस्थी से से दूर होने लगा तथा विरक्त होकर यह एक पहाड़ी पर भगवान विट्ठल के नाम का स्मरण करने लगे, और चैतन्य प्रभु से उपदेश पाकर अपने आप को मानव सेवा में समर्पित कर दिया।

संत तुकाराम की शिक्षा Education of sant tukaram 

संत तुकाराम का वास्तविक कोई गुरु नहीं था। संत तुकाराम ने स्वयं ही गृहस्थ जीवन के कष्टों को देखकर सन्यास का मन बनाया, किंतु उन्होंने ग्रस्त जीवन में रहकर ही सबसे पहले अपने गांव में ही भवनाथ पहाड़ी पर जाकर भगवान विट्ठल के नाम का स्मरण करना शुरू कर दिया, जब भी उन्हें अपने घर से खाली समय मिलता वह भवनाथ पहाड़ी पर जाते और भगवान विट्ठल के नाम का जाप करते रहते थे।

बहुत समय बीतने के पश्चात एक बार स्वप्न में बाबा चैतन्य प्रभु ने उन्हें रामकृष्ण हरी का मंत्र का उपदेश दिया और ज्ञान प्राप्त करके संत तुकाराम ने अपने जीवन के 17 वर्ष मानव सेवा तथा समाज कल्याण में व्यतीत कर दिए। संत तुकाराम की भगवान के प्रति भक्ति भावना देखकर तथा सच्चे बैरागी और सेवा भाव को जानकर जो लोग उनकी निंदा करते थे

वह भी उनके भक्त बन गए। संत तुकाराम भागवत धर्म का उपदेश देते लोगों को सत्य अहिंसा और धर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा और ज्ञान देते। संत तुकाराम की मुख से समय-समय पर परिस्फुटित होनेवाली 'अभंग' वाणी के अतिरिक्त इनकी अन्य कोई विशेष साहित्यिक कृति नहीं संत तुकाराम के शिष्यों के द्वारा लिखित 4000 अभंग आज भी विधमान है। 

संत तुकाराम द्वारा समाज सुधार के लिए कार्य Social reformer work 

संत तुकाराम ने अधिकतर से लोगों को कल्याण और उत्थान की ही बात कही है और उन्होंने इस बात पर बल दिया है कि सभी मनुष्य परमपिता ईश्वर की संतान हैं, जब ईश्वर संतान में भेद नहीं करता तो हम लोग आपस में भेद क्यों करें? इस कारण हम सब समान हैं।

संत तुकाराम द्वारा 'महाराष्ट्र धर्म' का प्रचार हुआ, जिसके सिद्धांत भक्ति आंदोलन से प्रभावित थे और इसी महाराष्ट्र धर्म का तत्कालीन सामाजिक विचारधारा पर बहुत गहरा प्रभाव पङा, यद्यपि इसे जाति व्यवस्था और वर्णव्यवस्था पर कुठाराघात करने में सफलता प्राप्त नहीं हुई, किंतु इससे अस्वीकार भी नहीं किया जा सकता है, कि समानता के सिद्धांत के प्रतिपादन द्वारा इसके प्रणेता वर्णव्यवस्था को लचीला बनाने में अवश्य सफल हुए. आगे चलकर महाराष्ट्र धर्म का उपयोग श्री छत्रपती शिवाजी महाराज ने सभी वर्ग को एकसूत्र में बाँधने के लिए किया।

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