राजा दशरथ की कहानी Story of king dasharatha

राजा दशरथ की कहानी Story of king dasharatha 

हेलो दोस्तों आपका बहुत-बहुत स्वागत है हमारे इस लेख राजा दशरथ की कहानी (Story of king Dasheath) में दोस्तों इस लिए एक में आप राजा दशरथ की विभिन्न कहानियों के बारे में जानेंगे दोस्तों आप जानते हैं 

कि राजा दशरथ अयोध्या के परमप्रतापी प्रजावत्सल राजा थे, जिन्हे भगवान विष्णु के पिता का सौभाग्य प्राप्त है तो आइए जानते हैं दोस्तों राजा दशरथ के कौन थे और उनकी कहानी क्या थी।

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राजा दशरथ की कहानी


राजा दशरथ की जन्म कहानी Birth Story of King Dasharatha

राजा दशरथ की कहानी बहुत ही रोचक है, धर्म ग्रंथो के  आधार पर कहा जाता है, कि राजा दशरथ पूर्व जन्म में स्वयंभुव मनु थे तथा इनकी पत्नी का नाम सतरूपा था।  

इन दोनों से ही संसार की उत्पति हुई है, इन्होने भगवान विष्णु की घोर तपस्या की थी तथा दशरथ कौशल्या के रूप में भगवान विष्णु के माता - पिता होने का वरदान प्राप्त किया था। 

महाराज दशरथ का जन्म की विचित्र कहानी है, बताया जाता है की ब्रम्हा जी से मरीचि का प्रादुर्भाव हुआ था, जिनके पुत्र कश्यप जी थे। कश्यप जी के वंश में ही जन्म लिया इक्ष्वाकु ने 

जिन्होंने अयोध्या नगरी को बसाकर उसे अपनी राजधानी बनाया था तथा उनके नाम पर इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की। इसी कुल में जन्मे थे महान राजा भगीरथ 

जिन्होंने अपनी तपस्या के बल पर गंगा माता को पृथ्वी पर आने के लिए कहा इनके कुल में जन्मे महान राजा रघु, जिससे इस वंश को रघुवंश कहने लगे। 

इसी कुल में जन्म लिया राजा नाभाग ने, जिनके पुत्र थे राजा अज जो रघुवंश के 38 वे राजा थे तथा दशरथ के पिता थे दशरथ की माता का नाम इंदुमती था।

एक बार राजा अज दोपहर की पूजा कर रहे थे। उस समय रावण उनसे युद्ध करने के लिए आया और उसने   दूर से राजा अज को पूजा अर्चना करते देखा। 

राजा अज ने भगवान शिव की वंदना की और जल पीछे फेंक दिया यह देखकर रावण बड़ा आश्चर्यचकित हुआ और वह राजा अज के पास पहुँचा तथा पूछने लगा 

कि हमेशा पूजा करने के बाद जल आगे अर्पित किया जाता है ना कि पीछे आपने ऐसा क्यों किया? तब राजा अज ने बड़े ही मधुर स्वर में उत्तर दिया जब मैं आंखें बंद करके भगवान शिव का ध्यान कर रहा था

तभी मुझे यहाँ से एक योजन दूर जंगल में एक गाय घास चरती हुई दिखाई दी और मैंने देखा, कि एक खूंखार सिंह उस पर आक्रमण करने वाला है, इसलिए मैंने जल पीछे की तरफ फेका 

जिससे जल ने तीर का रूप धारण कर लिया और उस सिंह की मृत्यु हुई। रावण को यह बात सुनकर बड़ा ही आश्चर्य हुआ, किंतु राजा अज ने कहा तुम यहाँ से एक योजन दूर जाकर यह सब देख सकते हो। 

रावण सत्य जानने वहाँ पहुँचा और देखा, वास्तव में एक गाय हरी घास चर रही है, जबकि शेर के पेट में वाण लगा है, अब रावण को पूर्णतः विश्वास हो गया, कि जिस राजा के जल से ही बाण बन जाते हैं 

और बिना किसी निशाना लगाए ही शत्रु मर जाता है, ऐसे वीर पुरुष को जीतना बड़ा ही असंभव है और वह राजा अज से बिना युद्ध किए ही लंका लौट गया

एक बार जब राजा अज वन में भ्रमण करने के लिए गए थे तो उन्हें एक बहुत ही सुंदर तालाब दिखाई दिया उस तालाब में एक कमल का फूल (Lotus Flower) था जो बहुत सुंदर प्रतीत हो रहा था। 

उस कमल को प्राप्त करने के लिए राजा अज तालाब में कूद गए किंतु राजा अज जितना भी उस कमल के पास जाते वह कमल उनसे उतना ही दूर चला जाता 

और राजा अज ने उस कमल को नहीं पकड़ पाया तभी आकाशवाणी हुई कि हे! राजन आपको कोई संतान नहीं है आप इस कमल के योग्य नहीं है 

ऐसी भविष्यवाणी ने राजा अज के हृदय में एक भयंकर आघात किया। राजा अपने महल में लौट आए और उन्हें संतान की चिंता रहने लगी क्योंकि उन्हें संतान नहीं थी 

जबकि राजा अज भगवान शिव के बड़े भक्त थे। कुछ समय बाद भगवान शिव उनकी इस चिंता से व्याकुल हो उठे और उन्होंने धर्मराज को आदेश दिया और कहा

तुम ब्राह्मण के भेष में अयोध्या नगरी पहुँचों, जिससे राजा अज को संतान की प्राप्ति होगी धर्मराज और उनकी पत्नी ब्राह्मण और ब्राह्मणी की वेश में उसी क्षण सरयू नदी के किनारे कुटिया बनाकर रहने लगे। 

एक बार घर्मराज ब्राह्मण के रूप में ही राजा अज के दरबार में गए और उनसे भिक्षा की याचना करने लगे। तब राजा ने अपने खजाने में से ब्राह्मण को सोने की अशर्फियां देनी चाही 

लेकिन ब्राह्मण ने कहा, कि यह प्रजा का है आप अपना कुछ दीजिए तब राजा अज ने अपने गले का हार उतारकर ब्राह्मण को देने लगे, किंतु ब्राह्मण ने फिर मना कर दिया कि यह भी प्रजा की ही धन संपत्ति है 

इस प्रकार राजा अज को बड़ा दुख हुआ कि आज एक ब्राह्मण उनके दरबार से खाली हाथ जा रहा है तब राजा अज रात्रि में एक मजदूर का रूप बनाते हैं 

और नगर में काम के लिए निकल जाते हैं। वह एक लौहार के घर पहुंचते हैं और वहाँ काम करने लग जाते हैं। पूरी रात को बड़े घन से लोहे का काम करते हैं, जिसके बदले में उन्हें एक् टका मिलता है। 

अब राजा एक टका को लेकर ब्राह्मण को देने के लिए उनके घर पहुंचते हैं, लेकिन वहाँ ब्राह्मण उपस्थित नहीं था तो राजा ने वह एक टका ब्राह्मण की पत्नी को दे दिया और कहा, कि इसे ब्राह्मण को दे देना यह मेरी मेहनत का कमाया हुआ है, 

जब वह ब्राह्मण घर आया तो उस ब्राह्मण की पत्नी ने राजा का दिया हुआ टका ब्राह्मण को दिया, परन्तु ब्राह्मण के मन में यह देख बहुत क्रोध आया और उसने  उस टका को जमीन पर फेंक दिया तभी अचानक आश्चर्यजनक घटना हुई, उस ब्राह्मण ने जिस स्थान पर टका फेंका था

उस स्थान पर गड्ढा हो गया और वह टका उस गड्ढे में समा गया ब्राह्मण ने उस गढ्ढे को खोदा तो उसमें से सोने का एक रथ निकला तथा आसमान की तरफ चला गया इसके पश्चात ब्राह्मण ने फिर गढ्ढा खोदा तो फिर दूसरा सोने का रथ निकला 

और आसमान में चला गया इसी प्रकार से, एक के बाद एक नौ सोने के रथ निकले और आसमान की तरफ चले गए अंततः जब दसवाँ रथ निकला तो उस पर एक बालक था और वह रथ जमीन पर आकर रूक गया

ब्राह्मण ने उस बालक को सीने से लगाया तथा लेकर राजा अज के दरबार में गया और कहा राजन इस पुत्र को स्वीकार कीजिए यह आपका ही पुत्र है, जो तुम्हारे एक टका से पैदा हुआ है 

तथा इसके साथ में नौ स्वर्ण रथ निकले जो आसमान में चले गए, जबकि यह बालक दसवें रथ पर निकला इसलिए यह रथ तथा पुत्र आपका है। इस प्रकार से दशरथ जी का जन्म हुआ

राजा दशरथ की कहानी

राजा दशरथ के मुकुट की कहानी Story of king dasaratha's crown

एक बार की बात है, जब राजा दशरथ वन में शिकार करने के लिए गए थे, तो संयोगवश उनका सामना वानरराज बाली से हो गया और किसी बात पर बाली को इतना क्रोध आया, कि अचानक ही दोनों के बीच इतना भयंकर युद्ध छिड़ गया, कि

दोनों राजा एक दूसरे के खून के ऐसे प्यासे हो गए, जैसे वे सदियों से एक दूसरे के शत्रु हों, उस समय वहाँ पर रानी केकई भी उपस्थित थी। तब वानरराज बाली ने महाराजा दशरथ से यह शर्त रखी, कि यदि तुम इस युद्ध में हार जाओगे तो

अपना राज मुकुट यहाँ छोड़ जाना अन्यथा महारानी कैकेई को, क्योंकि बाली यह जानता था, कि राजा दशरथ उनके सामने अधिक देर तक नहीं टिकने वाले 

क्योंकि बाली को परमपिता ब्रम्हा से यह वरदान प्राप्त था की वह किसी भी योद्धा की आदी शक्ति अपने शरीर में खींच सकता था। दोनों योद्धाओं के बीच भयंकर युद्ध हुआ अंततः महाराज दशरथ युद्ध हार गए और उन्होंने अपना राजमुकुट वाली को दे दिया। 

इस पर रानी केकई को अपने ऊपर बहुत ही क्रोध आया और उन्हें राजमुकुट वापस लाने की चिंता सताने लगी। कहा जाता है, इसीकारण उन्होंने भगवान श्री राम को 14 वर्ष का वनवास दिया 

और कहा बाली के पास अयोध्या की शान राजमुकुट है, उसे वापस लेकर जरूर आना। जब भगवान श्रीराम ने बाली का वध किया था और बाली से संवाद हुआ था 

तो श्रीराम ने उस राजमुकुट के बारे में पूछा बाली ने भगवान श्रीराम को बताया, कि मैंने एक बार राजा रावण को बंदी बनाया था, तभी वह मेरे चुंगल से निकल गया और वह राजमुकुट भी चुरा कर ले गया

आपका राजमुकुट वापस लाने में मेरा पुत्र अंगद आपकी सहायता करेगा। जब अंगद शांतिदूत बनकर अयोध्या पहुँचा तो उसने अपना पैर जमीन इस प्रकार से टिका लिया, कि उसे कोई नहीं हटा सकता था।

अंगद ने यह विद्या अपने पिता बाली से सीखी थी और इन दोनों के अलावा इस विद्या के बारे में और कोई भी योद्धा नहीं जानता था। 

जब सभी योद्धाओं ने अंगद का पैर नहीं उठा पाया तो महाराज रावण स्वयं पैर उठाने के लिए आए और पैर उठाने के लिए झुके तभी उनका मुकुट उनके मस्तक से नीचे गिर गया जिसे 

बाली पुत्र अंगद ने उठाकर भगवान श्रीराम के चरणों में फेंक दिया। इस प्रकार से महाराज दशरथ तथा अयोध्या का राजमुकुट वापस आया था।

राजा दशरथ और श्रवण की कहानी Story of King Dasharatha and Shravan

यह बात उस समय की है, जब महाराज दशरथ वन में शिकार करने गए थे तभी उन्होंने तालाब के पास किसी जानवर की पानी पीने की आवाज सुनाई दी और उन्होंने शब्दभेदी बाण चला दिया।

और उस समय शब्दभेदी बाण चलाने में महाराज दशरथ सबसे निपुण थे, इसलिए वह सीधा उस प्राणी को लगा जो पानी पी रहा था और वह कोई जानवरनहीं श्रवण था, वह वाण श्रवण की छाती में जाकर लगा,  जिससे श्रवण की दर्द के मारे चीख निकल गई।

मनुष्य की चीख सुनकर महाराज दशरथ घबरा गए और तालाब की तरफ दौड़े और उन्होंने देखा, कि उनका शब्दभेदी बाण एक व्यक्ति के सीने में धंसा हुआ है, 

जो उस तालाब में पानी पीने के लिए आया हुआ था। महाराज दशरथ ने उस व्यक्ति श्रवण को अपनी गोदी में ले लिया और अपनी गलती पर पछताने लगे तब श्रवण ने कहा यहाँ से थोड़ी दूर मेरे अंधे और बूढ़े माता-पिता प्यासे बैठे हुए हैं, जो प्यासे है 

कृपया जाकर उन्हें पानी पिला देना इतना कहते ही श्रवण ने प्राण त्याग दिए। महाराज दशरथ संकोच करते हुये पानी लेकर श्रवण के माता पिता के पास पहुंचे

और उन्होंने अपना परिचय दिया, कि वह अयोध्या के महाराजा दशरथ है और दुर्भाग्यवश आप के पुत्र का वध उनके हाथों से हो गया है। 

इतना सुनते ही श्रवण के माता पिता चीँख चीँख कर रोने लगे और उन्होंने महाराज दशरथ को श्राप दिया, जिस प्रकार हम अपने पुत्र के वियोग में प्राण त्याग रहे हैं, 

उसी प्रकार से तुम भी अपने पुत्र के वियोग में प्राण त्याग दोगे और यह उनका कथन सत्य हुआ जब भगवान श्री राम वनवास गए तब महाराज दशरथ ने अपने प्रिय पुत्र राम के वियोग में प्राण त्याग दिए।

दोस्तों आपने इस लेख में राजा दशरथ की कहानी (Story of king dashrath) पढ़ी, आशा करता हूँ, यह कहानी आपको अच्छी लगी होगी।

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